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March 18, 2026 Author: Divya Gautam
19 मार्च 2026 से चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो रहा है। हिंदू धर्म में नवरात्रि का समय केवल व्रत और उपवास का नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और भक्ति के मार्ग पर चलने का एक दिव्य अवसर है। नवरात्रि के ये नौ दिन मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा के लिए समर्पित हैं, जो हमें साहस, संयम और ज्ञान का आशीर्वाद देते हैं। प्रथम दिन मां शैलपुत्री की स्थिरता से लेकर अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूर्णता तक, हर स्वरूप हमारे जीवन के दुखों को दूर करने की शक्ति रखता है। सही विधि से की गई साधना से घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है और हमारी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी दुर्गा और असुर महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध चला। जब महिषासुर के अत्याचारों से देवलोक में संकट बढ़ गया, तब सभी देवताओं की शक्तियों से मां भगवती का प्राकट्य हुआ। नौ दिनों के कठिन संग्राम के बाद, दसवें दिन देवी ने महिषासुर का वध किया, जिसे अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।
हालांकि, चैत्र नवरात्रि का समापन राम नवमी के साथ होता है, जो भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है।
नवरात्रि के ये नौ दिन हमें यह सिखाते हैं कि जीवन की किसी भी चुनौती को पार करने के लिए धैर्य, साहस और निरंतर प्रयास आवश्यक है। यह पावन समय हमें यह भी समझाता है कि हमारी सबसे बड़ी बाधा हमारे भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियां हैं, और उन पर विजय प्राप्त करना ही सच्ची शक्ति और साधना है।
कलश स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें। 19 मार्च 2026 को सुबह 06:15 से 08:20 तक का समय सबसे श्रेष्ठ है।
कलश और जल: मिट्टी, तांबे या पीतल का शुद्ध कलश और उसमें भरने के लिए गंगाजल युक्त साफ पानी।
नारियल और चुनरी: जटा वाला नारियल, जिसे लपेटने के लिए एक छोटी लाल चुनरी या कलावा।
आम के पत्ते: कलश के मुख पर सजाने के लिए कम से कम 5 या 7 ताजे आम के पत्ते।
मिट्टी और जौ: जौ बोने के लिए मिट्टी का एक चौड़ा पात्र (वेदी) और साफ छनी हुई मिट्टी।
पवित्र सामग्री: कलश के जल में डालने के लिए एक सिक्का, सुपारी और अक्षत (बिना टूटे चावल)।
रोली और चंदन: कलश पर शुभ ‘स्वास्तिक’ बनाने और मां के तिलक के लिए।
चौकी और लाल कपड़ा: मां की मूर्ति या चित्र स्थापित करने के लिए लकड़ी की चौकी और उस पर बिछाने के लिए नया लाल कपड़ा।
कलावा (मौली): कलश के गले और नारियल पर बांधने के लिए रक्षा सूत्र।
नवरात्रि के 9 दिन: मां के स्वरूप, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
नवरात्रि के पहले दिन हिमालय की पुत्री मां शैलपुत्री की पूजा होती है। यह स्थिरता और शक्ति का प्रतीक हैं।
पूजा विधि: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, कलश स्थापना करें और मां को सफेद फूल अर्पित करें। मां को गाय के घी का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
शुभ मुहूर्त: सुबह 06:15 से 08:20 तक।
आरती का समय: सूर्योदय के समय और संध्या आरती शाम 06:30 बजे।
मां का दूसरा स्वरूप तपस्या और संयम का संदेश देता है। मां ब्रह्मचारिणी के हाथ में जप की माला और कमंडल होता है।
पूजा विधि: मां को शक्कर और पंचामृत का भोग लगाएं। ‘ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः’ मंत्र का जाप करें। यह मन को एकाग्र करने में मदद करता है।
शुभ मुहूर्त: सुबह 07:30 से 09:10 तक।
आरती का समय: शाम 06:45 बजे।
मां के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, जो शांति और वीरता का प्रतीक है। इनकी पूजा से भय दूर होता है।
पूजा विधि: मां को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। लाल रंग के फूल चढ़ाएं। इससे साहस और आत्मविश्वास बढ़ता है।
शुभ मुहूर्त: सुबह 06:20 से 08:45 तक।
आरती का समय: शाम 07:00 बजे।
ब्रह्मांड की रचना करने वाली मां कूष्मांडा सूर्य मंडल के भीतर निवास करती हैं। इनकी मंद मुस्कान से ही सृष्टि का निर्माण हुआ है।
पूजा विधि: मां को मालपुए का भोग लगाएं। कुम्हड़े (पेठा) की बलि या भोग चढ़ाना इन्हें प्रिय है। यह स्वास्थ्य में सुधार की संभावना बढ़ाता है।
शुभ मुहूर्त: सुबह 08:15 से 10:30 तक।
आरती का समय: शाम 06:50 बजे।
भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। यह मोक्ष का द्वार खोलने वाली माता हैं।
पूजा विधि: मां की गोद में कार्तिकेय जी विराजमान होते हैं। इन्हें केले का भोग लगाएं। इनकी पूजा से संतान सुख और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
शुभ मुहूर्त: सुबह 07:00 से 09:25 तक।
आरती का समय: संध्या 07:15 बजे।
ऋषि कात्यायन की पुत्री होने के कारण इन्हें कात्यायनी कहा जाता है। महिषासुर का वध करने वाली यह देवी अत्यंत पराक्रमी हैं।
पूजा विधि: मां को शहद का भोग लगाना बहुत प्रिय है। पीले रंग के वस्त्र पहनकर इनकी पूजा करना शुभ माना जाता है। यह विवाह की बाधाएं दूर करने में सहायक है।
शुभ मुहूर्त: सुबह 06:30 से 08:50 तक।
आरती का समय: शाम 07:10 बजे।
यह मां का सबसे उग्र स्वरूप है, जो शत्रुओं और बुरी शक्तियों का नाश करता है। इनका रंग अंधकार जैसा काला है, लेकिन ये सदैव शुभ फल देती हैं।
शक्ति और पूजा विधि: मां को गुड़ का भोग लगाएं। रात के समय इनकी विशेष पूजा की जाती है। यह डर को खत्म कर आपकी इच्छाएं पूरी करने की शक्ति देती हैं।
शुभ मुहूर्त: सुबह 06:18 से 09:20 तक।
आरती का समय: संध्या 07:30 बजे।
मां का यह स्वरूप पूर्णतः गौर वर्ण का है और अत्यंत शांत है। इस दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है।
पूजा विधि: मां को नारियल का भोग लगाएं। इस दिन आठ साल की कन्याओं का पूजन कर उन्हें भोजन कराना चाहिए। इससे सुख-समृद्धि बढ़ती है।
शुभ मुहूर्त: सुबह 07:10 से 09:40 तक।
आरती का समय: शाम 07:20 बजे।
नवरात्रि का अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री का है, जो सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। भगवान शिव ने भी इनसे ही सिद्धियां प्राप्त की थीं।
पूजा विधि: मां को तिल और हलवा-पूरी का भोग लगाएं। इस दिन व्रत का पारण (समापन) किया जाता है। इनकी कृपा से जीवन का हर कार्य सफल होने की संभावना बढ़ती है।
शुभ मुहूर्त: सुबह 06:20 से 10:15 तक।
आरती का समय: सुबह और संध्या आरती विशेष रूप से करें।
चैत्र नवरात्रि का यह उत्सव हमें सिखाता है कि किस तरह अनुशासन और श्रद्धा से हम अपने जीवन की बाधाओं को पार कर सकते हैं। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की यह आराधना हमारे मन को शुद्ध कर हमें नई ऊर्जा से भर देती है। जब हम इन नौ दिनों में पूरे समर्पण के साथ मां की शरण में होते हैं, तो जीवन में सुख और शांति का संचार होता है।
मां की कृपा से हमारे बिगड़े काम बनने लगते हैं और हर कदम पर उनका आशीर्वाद महसूस होता है। इस नवरात्रि, मां भगवती आप सभी के घर को खुशियों और अटूट विश्वास से भर दें। याद रखें, सच्ची भक्ति वही है जो हमें दूसरों के प्रति दयालु और खुद के प्रति ईमानदार बनाए।
इस वर्ष कलश स्थापना 19 मार्च 2026 को की जाएगी। इसके लिए सबसे शुभ मुहूर्त सुबह 06:15 से 08:20 तक रहेगा। इस समय में पूजा करना सबसे फलदायी माना जाता है।
नहीं, नवरात्रि के नौ दिनों में सात्विक भोजन का महत्व है। तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज और मांसाहार से पूरी तरह दूर रहना चाहिए ताकि मन और शरीर की शुद्धि बनी रहे।
यदि स्वास्थ्य या किसी अन्य कारण से आप पूरे नौ दिन व्रत नहीं रख सकते, तो पहले (प्रतिपदा) और आठवें (अष्टमी) दिन का व्रत रखना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। इससे भी मां की कृपा मिलने की संभावना रहती है।
वैसे तो सप्तमी के बाद किसी भी दिन कन्या पूजन किया जा सकता है, लेकिन महाष्टमी (26 मार्च) और महानवमी (27 मार्च) के दिन कन्या पूजन करना विशेष रूप से फलदायी होता है।
अखंड ज्योति मां के प्रति हमारी अटूट आस्था का प्रतीक है। यह घर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और ज्ञान का प्रकाश फैलाती है। इससे हमारी सभी इच्छाएं पूर्ण होने का मार्ग प्रशस्त होता है।