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January 16, 2026 Author: Divya Gautam
सनातन धर्म में मौनी अमावस्या को अत्यंत पवित्र दिन माना गया है। यह दिन आत्मशुद्धि, मौन साधना, तप और पितृ तर्पण से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2026 में मौनी अमावस्या 18 जनवरी की रात 12:03 बजे से प्रारंभ होकर 19 जनवरी की रात 1:21 बजे तक रहेगी। इस दिन विशेष रूप से गंगा स्नान, दान और तर्पण का धार्मिक महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए कर्म व्यक्ति के मानसिक और आध्यात्मिक जीवन को शुद्ध, संतुलित और सुखमय बनाते हैं।
मौनी अमावस्या को सनातन परंपरा में मौन, संयम और गहन आत्मचिंतन का दिन माना जाता है। इस दिन मौन का पालन करते हुए गंगा स्नान करने से साधक की चंचल इंद्रियां शांत होती हैं और मन की अशुद्धियां दूर होती हैं। गंगा को मोक्ष देने वाली दिव्य नदी कहा गया है।
पुराणों में वर्णन मिलता है कि अमावस्या तिथि पर गंगा स्नान से न केवल बाहरी अशुद्धियां मिटती हैं, बल्कि मन में जमी नकारात्मक प्रवृत्तियों, विकार और अशांति भी समाप्त होती हैं। मौनी अमावस्या पर यह पुण्य और अधिक फलदायी माना गया है। इसलिए प्रयागराज, हरिद्वार, वाराणसी और गंगासागर जैसे तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ इस दिन देखी जाती है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार मौनी अमावस्या के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति को जाने-अनजाने किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। यह केवल बाहरी कर्मों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मन और विचारों से जुड़े दोषों पर भी प्रभाव डालता है।
मान्यता है कि क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष जैसे मानसिक विकारों का नाश होता है और मन निर्मल बनता है। इसके अलावा, वाणी से किए गए दोष, कर्मजन्य पाप और अनजाने अपराधों से भी राहत मिलती है। इसे पितृ दोष शांति का भी प्रभावी उपाय माना गया है। गंगा स्नान पूर्व कर्मों के भार को हल्का करता है और जीवन में सकारात्मकता, शांति और सद्भाव का संचार करता है।
मौनी अमावस्या पर केवल गंगा स्नान ही नहीं, बल्कि दान और साधना भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस दिन किए गए दान को कई गुना पुण्यफल प्राप्त होता है। अन्न, वस्त्र, तिल, कंबल और धन का दान करने से दरिद्रता और अभाव दूर होते हैं तथा जीवन में संतुलन आता है।
साथ ही, मौन का पालन करते हुए जप, ध्यान और आत्मचिंतन करने से मन की चंचलता शांत होती है। साधक को आंतरिक स्थिरता मिलती है और यह दिन सांसारिक शोर, अनावश्यक बोलचाल और व्यर्थ की गतिविधियों से दूर रहने का अवसर प्रदान करता है। मौनी अमावस्या की साधना से आत्मबल, धैर्य और सकारात्मक दृष्टि का विकास होता है, जिससे जीवन के निर्णय संतुलित और विवेकपूर्ण बनते हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब पितरों को उनका उचित सम्मान, श्राद्ध या तर्पण नहीं मिलता, तब पितृ दोष उत्पन्न होता है। इसका प्रभाव जीवन में बाधा, मानसिक अशांति, पारिवारिक कलह और कार्यों में विघ्न के रूप में देखा जाता है।
मौनी अमावस्या पर विधिपूर्वक किया गया तर्पण पितृ दोष को शांत करने में सहायक होता है। जल, तिल और कुश से किया गया तर्पण पितरों तक पहुंचता है और उनकी असंतुष्टि को समाप्त करता है। इससे पितृ दोष का प्रभाव धीरे-धीरे कम होता है और जीवन में सुख, शांति और सकारात्मक परिवर्तन आते हैं।
मौनी अमावस्या पर तर्पण केवल पितरों तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। तर्पण से पितृ दोष शांत होने पर परिवार में सुख-शांति, स्वास्थ्य और आपसी सामंजस्य बढ़ता है। संतान से जुड़े कष्ट, आर्थिक रुकावटें और मानसिक तनाव धीरे-धीरे कम होने लगते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से तर्पण व्यक्ति को विनम्रता, कृतज्ञता और संस्कारों से जोड़ता है। यही कारण है कि मौनी अमावस्या पर तर्पण को केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाला पवित्र संस्कार माना गया है।
तर्पण से पहले शुद्धता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र जल से स्नान करें। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके शांत स्थान पर बैठें। तर्पण से पहले मन में पवित्र भावना रखते हुए पितरों के स्मरण का संकल्प लें। हाथ में जल, तिल और कुश लेकर पितरों का ध्यान करें और अपने गोत्र व पितरों के नाम का स्मरण करें।
यह तैयारी तर्पण को भावपूर्ण बनाती है और श्रद्धा के साथ किया गया कर्म पितरों तक पहुंचता है। तर्पण के समय मन शांत और मौन में रहना विशेष लाभकारी होता है। पितृ सूक्त या पितृ चालीसा का पाठ करने से कर्म की प्रभावशीलता बढ़ती है। यह विधि पितरों को तृप्त करती है और उनके आशीर्वाद का अनुभव कराती है।